धमतरी | नगरी। विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत ऐसी है कि मासूम बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए जान हथेली पर रखनी पड़ रही है। नगरी विकासखंड के गणेश घाट–देउरपारा मार्ग पर 1 करोड़ 87 लाख रुपये की लागत से बन रहा पुल अब लोगों के लिए राहत नहीं, बल्कि मुसीबत बन गया है।
पुराने पुल को तोड़कर नया पुल बनाया जा रहा था। आवागमन के लिए बनाया गया अस्थायी पुल लगातार बारिश और तेज बहाव में बह गया। अब हालात ऐसे हैं कि परिजन छोटे-छोटे बच्चों को गोद में उठाकर उफनते पानी के बीच से टूटा पुल पार करा रहे हैं। एक छोटी सी चूक किसी बड़े हादसे में बदल सकती है।
हर दिन खतरे से मुकाबला
टूटे पुल के बीच गहरा कटाव हो चुका है। बहता पानी, फिसलन और कमजोर रास्ता हर कदम पर खतरे की चेतावनी दे रहा है। इसके बावजूद सैकड़ों छात्र-छात्राएं स्कूल पहुंचने के लिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। कई बच्चे डर के कारण बीच रास्ते से ही वापस लौट रहे हैं।
7 से 8 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर
बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए कई अभिभावक अब उन्हें दूसरे रास्ते से स्कूल भेज रहे हैं। इससे रोजाना 7 से 8 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। समय और पैसे दोनों का बोझ बढ़ गया है, लेकिन बच्चों की जान बचाना उनकी मजबूरी बन चुकी है।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि पीडब्ल्यूडी विभाग समय पर पुल निर्माण पूरा कर देता या मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था करता, तो आज यह स्थिति नहीं बनती। अधूरा निर्माण और टूटा अस्थायी पुल अब पूरे क्षेत्र के लिए खतरा बन चुका है।
बड़ा सवाल
क्या किसी मासूम की जान जाने के बाद ही प्रशासन जागेगा?
अगर हादसा होता है तो जिम्मेदार कौन होगा—
ठेकेदार?
पीडब्ल्यूडी विभाग?
या फिर प्रशासन?
ग्रामीणों ने तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग, अस्थायी पुल की मरम्मत और निर्माण कार्य में तेजी लाने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर अब भी लापरवाही जारी रही, तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।



