एकादशी पर उमड़ती है ग्रामीणों की भीड़, विजय के प्रतीक के रूप में पुतले की मिट्टी घर ले जाते हैं श्रद्धालु; महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित
नगरी। धमतरी जिले के नगरी विकासखंड अंतर्गत ग्राम छिपलीपारा में एकादशी के अवसर पर सहस्रबाहु रावण वध की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। यहां मिट्टी से निर्मित निर्वस्त्र सहस्रबाहु के पुतले का वध माता शीतला के खड्ग से किया जाता है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस आयोजन की एक विशेष बात यह है कि यहां महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।
परंपरा के अनुसार, शीतला मंदिर के पुजारी माता शीतला के खड्ग से मिट्टी से बने सहस्रबाहु के पुतले का वध करते हैं। ग्रामीण इसे विजय का प्रतीक मानते हैं और पुतले की मिट्टी अपने साथ घर ले जाते हैं। इस अनूठी धार्मिक परंपरा को लेकर क्षेत्र में विशेष आस्था और उत्सुकता बनी रहती है।
माता शीतला और सहस्रबाहु वध की मान्यता
सिहावा शीतला शक्ति पीठ के अध्यक्ष के अनुसार, छिपलीपारा में सहस्रबाहु वध की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। इसके पीछे एक धार्मिक मान्यता प्रचलित है।
मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम जब लंकापति रावण का वध करने के बाद माता सीता से मिले, तब माता सीता ने उन्हें बताया कि युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है और सहस्रबाहु का वध करना भी शेष है। इसके बाद भगवान श्रीराम ने सहस्रबाहु पर आक्रमण किया, लेकिन ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदान के कारण वे उसका वध नहीं कर सके।
कथा के अनुसार, सहस्रबाहु ने मर्यादा का उल्लंघन करते हुए माता सीता के सामने निर्वस्त्र होकर उन्हें ललकारा। तब माता सीता ने आदिशक्ति का रूप धारण किया और अपने खड्ग से सहस्रबाहु का वध किया। इसके बाद माता शांत होकर धरती में समाहित हो गईं।
आस्था और परंपरा का अनूठा संगम
इसी धार्मिक मान्यता से जोड़कर छिपलीपारा में आज भी मिट्टी से बने निर्वस्त्र सहस्रबाहु के पुतले के वध की परंपरा निभाई जाती है। एकादशी के दिन होने वाला यह आयोजन क्षेत्र की प्राचीन लोकपरंपरा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर जुटने वाली ग्रामीणों की भीड़ इस परंपरा के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।

